
एक पुलिस सब इन्स्पेक्टर/इन्स्पेक्टर की अधूरी ज़िन्दगी

उन्नाव।
लोग अक्सर एक सब इन्स्पेक्टर/इन्स्पेक्टर की वर्दी देखते हैं, उसके कंधों पर सजे सितारे देखते हैं, उसका अधिकार, उसका रौब, उसकी जिम्मेदारियां देखते हैं, उसको कार मे बैठे देखते है और कार के डेस्क बोर्ड पर रखी हुई पी कैप देखते है। लेकिन उस वर्दी के पीछे छिपे उसके दर्द, पीड़ा और तिरस्कार को बहुत ही कम लोग देख पाते हैं जिसे वो हर पल जीता है। जब कोई उच्च शिक्षित युवक पुलिस सेवा में चयनित होता है तब उसके घर में खुशियों का माहौल होता है, माता-पिता भाई बहन गर्व से भर उठते हैं। पत्नी सुनहरे भविष्य के सपने सजाती है और बच्चे अपने पिता को अपना हीरो मानते हैं। लेकिन समय के साथ परिवार को यह एहसास होने लगता है कि यह केवल एक नौकरी ही नहीं बल्कि अरमानो की होली है, एक ऐसा त्याग है जिसकी कीमत पूरा परिवार जीवन भर चुकाता है। एक सब इन्स्पेक्टर/इन्स्पेक्टर का कार्यक्षेत्र अक्सर वहां नहीं होता जहां उसका परिवार रहता है बल्कि उसका वास्तविक ठिकाना वो थाना या चौकी बन जाता है जहां उसकी तैनाती होती है। उसका दिन कब शुरू होगा और कब समाप्त होगा, खाना पानी कब मिलेगा उसे खुद भी पता नही होता। अक्सर उसे दिन याद नही रहते बल्कि तारीख ज्यादा याद रहती है। इसका कारण यह है कि महीनों तक कोई साप्ताहिक रेस्ट नही होता। थाना प्रभारियों का तो जीवन और भी खराब है। पूरे वर्ष मे एक साप्ताह की भी छुट्टी नही मिल पाती है। यह बिल्कुल सम्भव है कि थाना प्रभारी/चौकी प्रभारी की हिसाब किताब करने के बाद आय से कमाई अधिक हो लेकिन पैसा सिर्फ ख़ुद की और परिवार की वास्तविक खुशियों का कारण नही बन सकता। बेटे का जन्मदिन हो, बेटी का वार्षिक समारोह हो, स्कूल में पेरेन्ट्स मीटिंग हो, दीक्षांत समारोह हो या स्वयं की मैरिज एनिवर्सरी हो इन सब अवसरों पर अक्सर वह परिवार के बीच से गायब ही मिलता है। जबकि उसकी पत्नी इस कर्तव्य को बखूबी निभाती है। पत्नी की तबीयत खराब हो, बूढ़े माता-पिता को दवा या सहारे की जरूरत हो उन पलों में भी वो मौजूद नहीं होता है बल्कि कहीं धरना-प्रदर्शन में ड्यूटी कर रहा होता है, किसी वीआईपी व्यवस्था में तैनात होता है, किसी अपराधी की तलाश में भटक रहा होता है या फिर रात- रात भर कम्प्यूटर पर बैठकर थाने में विवेचना पूरी कर रहा होता है। यदि विवेचना में थोड़ी सी भी गलती हो जाती है या इलाके में कोई बड़ी घटना हो जाती है तो उसी को दोषी मानते हुए तत्काल प्रभाव से सस्पेन्ड/लाइन हाजिर कर उसकी प्रारंभिक जांच खोल दी जाती है। वो बेचारा तो अपनी सफाई और अपने मन की बात भी किसी से कह तक नहीं पाता बल्कि मन ही मन घुटता रहता है। सबसे पीड़ादायक क्षण तब आता है जब उसका छोटा बच्चा फोन पर मासूमियत से पूछता है कि पापा आप घर कब आओगे? होली, दीपावली, ईद, बकरीद पर उसकी पत्नी ही बच्चो को कभी पिचकारी, गुलाल, पटाखे, नए कपड़े आदि दिलाकर उन मासूमो का दिल बहलाती है। पापा घर कब आओगे बच्चों के इस सवाल का कोई निश्चित जबाब उनके पास नहीं होता। कई बार छुट्टी स्वीकृत हो भी जाती है लेकिन किसी बड़ी घटना जैसे अपहरण, हत्या, लूट, बलात्कार, डकैती आदि घटना घटित हो जाने अथवा कानून-व्यवस्था की चुनौती सामने आ जाने एवं आकस्मिक ड्यूटी के कारण स्वीकृत शुदा छुट्टी भी रद्द हो जाती है। परिवार इन्तजार करता रह जाता है, पूर्व से तय किए गए कार्यक्रम निरस्त करने पड़ते हैं, ट्रेन और जहाज के टिकिट कैन्सल कराने पड़ते हैं। अन्ततः वह पुलिस ऑफिसर पुनः अपने कर्तव्य की ओर लौट जाता है। बदलते वक्त के साथ धीरे-धीरे पत्नी भी शिकायत करना छोड़ देती है। उसे भी भली भाँति मालूम हो जाता है कि शिकायत करने का कोई अर्थ नही है। उसे मालूम होता है कि उसका पति अपनी इच्छा से दूर नहीं है बल्कि वह अपने परिवार की खुशियों का त्याग करके हजारों परिवारों की सुरक्षा के लिए खड़ा है। एक सब इन्स्पेक्टर/इन्स्पेक्टर अपने बच्चों को बड़ा होते हुए अक्सर तस्वीरों और वीडियो कॉल के माध्यम से ही देखता है हालाँकि वह अपने बच्चो, माता-पिता की बढ़ती उम्र को महसूस तो करता है लेकिन उनके पास बैठने, उनसे बात करने और उनका हाथ थामने का समय नहीं निकाल पाता। वह अपने परिवार से कम प्यार नहीं करता, बस उसका कर्तव्य उसके प्रेम से पहले खड़ा हो जाता है। लोग अक्सर कहते हैं कि पुलिस वालों का दिल कठोर होता है। सच तो यह है कि उनका दिल भी उतना ही संवेदनशील और भावुक होता है जितना कि किसी और का। बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि उन्हें अपने आंसुओं को मुस्कान के पीछे छिपाने की आदत पड़ जाती है। रात के सन्नाटे में जब वह रात्रि अधिकारी के रूप मे थाने की कुर्सी पर बैठा होता है तब कभी-कभी उसे अपने घर की याद सताती है। बच्चों की हंसी, पत्नी का साथ और मां की दुआएं उसे याद आती हैं लेकिन तभी फोन की घंटी बजती है कि फला जगह पर एक्सीडेंट हो गया है या मारपीट हो रही है थाना मोबाइल को तुरन्त भेज दो या कोई महिला या पुरुष फरियादी आ जाता है। और बस वह सब कुछ दरकिनार कर फिर से अपने कर्तव्य में जुट जाता है। एक सब इन्स्पेक्टर/इन्स्पेक्टर की जिन्दगी में बहुत से लोग होते हैं लेकिन उसके अपने लोग अक्सर उससे दूर ही होते हैं। उसकी सबसे बड़ी मजबूरी यही है कि वह केवल अपने परिवार की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा के लिए जीता है।
शायद यही कारण है कि पुलिस की वर्दी सिर्फ एक साधारण वस्त्र नहीं होती बल्कि वह त्याग, जिम्मेदारी, संघर्ष और अनगिनत अधूरे पारिवारिक पलों की जीवंत कहानी होती है। जब भी किसी सब इन्स्पेक्टर/इन्स्पेक्टर को देखें! तो केवल उसके कंधों पर लगे सितारों को ना देखें बल्कि उन सितारों की चमक के पीछे छिपे त्याग, संघर्ष और अनकहे दर्द को भी महसूस करें। क्योंकि घर से जवान होकर निकला एक लड़का वर्दी पहनकर अपनी पूरी जिन्दगी दूसरों के घरों में खुशियां बनाए रखने में बिता देता है जबकि उसके अपने घर की खुशियां उसका इन्तजार करती रह जाती हैं। पुलिस की नौकरी करना कोई साधारण काम नही बल्कि इसमें खुद की और अपने परिवार की खुशियों का सौदा करना पड़ता है। पुलिस की वर्दी सिर्फ अपराधियों को ही खाक नही करती बल्कि उसके एवं उसके परिवार की खुशियों का भी खात्मा करती है। सिर्फ परिवार को पैसे भेजना, अच्छा घर बनवा देना, बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना और घर से सैकड़ो मील दूर रहकर खुद के लिए हर रोज दो जून की रोटी का जुगाड़ करना ही वास्तविक खुशी नही है। खुशियां यदि बाजार मे मिल सकतीं तो हर पुलिस वाला खुशियों को जरूर खरीद कर अपने परिवार के कदमों में डाल देता। यह वास्तविकता उन लोगों को अवश्य जानना चाहिए जो पुलिस को ना सिर्फ घृणा की नजर से देखते हैं बल्कि ना जाने कौन कौन से अपशब्दों से नवाजते हैं। यहां पर *इन्स्पेक्टर माबूद रज़ा* की ये स्वरचित लाइनें बहुत ही प्रासंगिक हैं कि –
*हमें हमदर्द ज़ालिम का बताना भूल जाओगे*
*हमें हर हर क़दम पर आज़माना भूल जाओगे*
*अगर तुम दो क़दम ही बस हमारे साथ चल लोगे*
*पुलिस वालों पे फिर उंगली उठाना भूल जाओगे*
*लुटा देते हैं तन मन धन जो इस संसार के खातिर*
*नहीं दे पाते हैं दो पल वही परिवार के खातिर*
*कहीं मां बाप अपने लाडले की राह तकते हैं*
*कहीं बच्चे तड़पते हैं पिता के प्यार के खातिर*
माबूद रज़ा
इन्स्पेक्टर, उ.प्र. पुलिस


















