
भगवान जगन्नाथ हुए गर्मी से बेहाल, 108 मटकों से किया स्नान, अब पीना पड़ेगा काढ़ा
भगवान जगन्नाथ को गर्मी शांत करने के लिए आज स्नान पूर्णिमा पर 108 मटकों के जल से स्नान करवाया जा रहा है। इसके बाद उन्हें काढ़ा पिलाया जाएगा और 14 दिनों तक विभिन्न जड़ीबूटियों से उनका इलाज किया जाएगा। आइए जानते हैं भगवान जगन्नाथ को स्नान करवाने की इस परंपरा के बारे में विस्तार से।
भगवान जगन्नाथ भी इन दिनों पड़ रही भीषण गर्मी से बेहाल हैं। आज स्नान पूर्णिमा यानी कि ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा पर उन्हें 108 स्वर्ण कलशों के जल से स्नान करवाया जा रहा है। इसके बाद अगले 14 दिनों तक एक बीमार की भांति उनकी सेवा की जाएगी। उन्हें काढ़ा पिलाया जाएगा और उनका इलाज किया जाएगा। भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलराम को स्नान करवाने की यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। इस स्नान के बाद भगवान 14 दिन के लिए बीमार पड़ जाते हैं। उसके बाद उन्हें 14 दिन के लिए काढ़ा दिया जाता है और कई जड़ीबूटियों से उनका इलाज होता है। इस दौरान मंदिर के कपाट भक्तों के लिए बंद कर दिए जाते हैं और भगवान 14 दिन के एकांतवास में चले जाते हैं। स्नान पूर्णिमा के दिन से ही जगन्नाथ रथ यात्रा के उत्सव की शुरुआत मानी जाती है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा से लेकर आषाढ़ अमावस्या की 15 दिनों की इस अवधि में भगवान सिर्फ फलों का रस और काढ़ा पीते हैं और उन्हें खिचड़ी जैसी साधारण व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। इस दौरान मंदिर में भगवान की सेवा एक बीमार बालक की तरह की जाती है। 15 दिनों तक एकांतवास में रहने के बाद भगवान पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं और फिर उनकी रथ यात्रा निकलती है। इस यात्रा के दौरान भक्तों को भगवान के दर्शन करवाए जाते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कैसे शुरू हुई यह परंपरा और क्या है इसका इतिहास।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर ऐसे होता है स्नान
गर्मी को शांत करने के लिए ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से आधी रात तक भगवान को स्नान करवाया जाता है। यह परंपरा 200 साल से भी अधिक पुरानी है। इस साल ज्येष्ठ पूर्णिमा 11 जून की है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम को 108 स्वर्ण कलशों से स्नान करवाया जाएगा। इस दौरान मंदिर को आम भक्तों के दर्शन के लिए बंद दिया जाएगा। सिर्फ पुरी ही नहीं बल्कि देश के सभी प्रमुख जगन्नाथ मंदिरों में इस परंपरा को पूरे विधि विधान से निभाया जाता है। स्नान के बाद 14 दिनों के लिए भगवान को काढ़ा पिलाकर उनका इलाज किया जाएगा। इस काढ़े में काली मिर्च, इलाइची,अदरक,तुलसी,कच्ची चीनी,मुलेटी, गुलाबजल जैसी चीजों होती हैं, जिनसे ये काढ़ा तैयार होता है। भगवान को इस काढ़े का भोग लगाने के बाद यह काढ़ा भक्तों में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति यह काढ़ा पूरे 14 दिन तक प्रसाद के रूप में पीता है वह पूरे साल निरोगी रहता है।
हर साल रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ते हैं।
यह घटना ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा से अमावस्या तक होती है। इस दौरान उन्हें मंदिर में आइसोलेशन में रखा जाता है। भक्तों के लिए मंदिर के दरवाजे 15 दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इसे मंदिर की भाषा में ‘अनासार’ कहते हैं। अनासार’ का मतलब है आइसोलेशन। जब भगवान बीमार होते हैं, तो उन्हें एक कमरे में रखा जाता है। इस दौरान कोई भी उन्हें देख नहीं सकता। उन्हें सिर्फ तरल पदार्थ दिए जाते हैं, जैसे कि जड़ी-बूटियों का पानी और काढ़ा। इस समय भगवान के दर्शन नहीं होते। यह परंपरा हजारों सालों से चली आ रही है। इसके पीछे एक पुरानी कहानी है।
रिपोर्ट RPS समाचार



















