🕉️ईश्वरानुभूति से ब्रह्मानंद का रसास्वादन🕉️

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🕉️ईश्वरानुभूति से ब्रह्मानंद का रसास्वादन🕉️

भावना का क्षेत्र बुद्धि नहीं है मन और बुद्धि तो दृश्य जगत के संबंध में सिर्फ तर्क कर सकते हैं। तर्क-वितर्क भावना में सहायक सहायक ही हो जावे पर भावना करा ही लेता है यह निश्चित नहीं है। हमारे शास्त्रों का कहना है-

अचिंत्या खलु ये भवः,

न तांस्तु तर्केण चिन्तयेत्।

जिन भावों को मन और बुद्धि ग्रहण नहीं कर सकते तो उनका निर्णय तर्क द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए लॉजिक के स्थान पर आचरण करना महत्वपूर्ण है। क्योंकि ऐसा हो जाता है कि जो लॉजिक सिद्ध कर दे सकता है वह आचरण की भावना से ओके न शुरू कर सकता है और लॉजिक के जिसे सिद्ध न किया जा सकता है।

भावना रूपी फल तो आचरण रूपी कार्य का है। जानिए ये और ऐसी अनेकों भावनाएँ। अन्योन्याश्रित शब्दों द्वारा हो ही नहीं सकता रसानुभूति की बात ले ली जावे। कत्था, मीठा, तीखा, कड़वा कसैला एवं स्वाद इस प्रकार का रस है। क्या कोई व्यक्ति इन स्वादों को सिद्ध कर सकता है और क्या यह भी तर्क द्वारा किया जा सकता है? कदापि नहीं। बल्कि इन रसों को बताने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। वस्तु दी गयी है खाने को, स्वाद लेने पर कहा जाता है ये कट्टा है, मीठा है आदि। उस भावना को प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति से अनंत तक क्या यह अमुक रस ही है, सिद्ध किया जा सकता है, केवल तर्क के आधार पर? नहीं. इसके लिए भी भावना का ही रसास्वादन किया जाता है। मन लो कि गुड़ खीरा होता है। मन लो कि एक कहते हैं कि गुड़ मीठा होता है और दूसरा कहते हैं कि मिठाई होती है। एक ऐसी जगह जहां इसे देखने के लिए मजबूर किया जाता है कि अगर विश्वास न हो तो चख कर देख लो। मूलतः व्यवहारिक बिना तर्क यहाँ निस्वत्व हो जाता है।

तब ईश्वर की साख को तर्क के आधार पर सिद्ध करने से उसकी भावना कैसे हो सकती है। उसकी सिद्धि के लिए या तो-उसकी भावना के लिए या तो स्वयं साधना की आवश्यकता होती है।

यह बात तो मासूमियत की है कि हर व्यक्ति अपने किसी न किसी कार्यक्रम का आधार बना रहा है। यहाँ तक उस निश्चित कार्यक्रम के विपरीत जब भी कोई व्यक्ति अपना कदम उठाना चाहता है तो उसे सफलता नहीं, विफलता ही हाथ लगती है जब कि निश्चित कार्यक्रम के आधार पर ही व्यक्ति संचालित हो रहा होता है।

टैब स्वभावतः यह प्रश्न हो सकता है कि इसका लीडर कौन है। और उसका उत्तर यह है कि इसमें कोई भी व्यक्ति शामिल नहीं है। और वह हमारा संचालक कहीं भी बाहर से ऑपरेशन नहीं करता है बल्कि इंजीलिमिटेड प्रविष्ट वह हमारी क्रिया शक्ति को प्रेरणा देता है, संचालित करता है। हमारे पंजीकृत शक्ति और अज्ञात प्रेरणाएँ हमारे द्वारा चलायी जाती हैं, यहाँ तक उन प्रेरणाओं से हम बंधते हैं।

सभी कोई कुछ न कुछ करते दिखाई देते हैं। लेकिन प्रेरणाओं की भावना मासूम नहीं होती इसीलिये दुःख और वेदनाओं का भ्रमर है। जिस समय व्यक्ति अपने वृत्तियों को अंतर्मुखी कर लेता है, वह उसे कार्य की प्रेरणाओं की भावना उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है और इस भावना के बाद वे कार्य करते हैं, उसके बाद भी, उसे शोक, दुःख, शोक आदि से भी प्रेरणा मिलती है। तब उसकी अज्ञात अवस्था में जागृति होती है और सुखानुभूति बढ़ती है, फिर जो उसे अज्ञात अवस्था में स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है, वे उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करते हैं। उसका मानना ​​है कि भगवान या ईश्वर अपनी बातें उससे दूर कर देते हैं और उसी के साथ-साथ जीवित रहते हैं। एक अनावृत्त श्रद्धा से भरा हुआ वह व्यक्ति अपने चारों ओर का दृश्य देखता है वह अपने एकाकीपन को भूल जाता है, अपनी दृढ़ता और अपनी शक्ति का ज्ञान प्राप्त करता है। मानव जीवन की चरम सिद्धि अनुभूति है। भावना के साथ श्रद्धा का संमिश्रण रहता है। श्रद्धा विश्वास के साथ चलती है। या भावना के. क्योंकि बिना विश्वास के भावना नहीं होती और बिना विश्वास के भावना नहीं होती असल में देखा तो ईश्वर की भावना हर इंसान में होती है। जब तक व्यक्ति की वृत्तियाँ होती हैं तब तक बहिर्मुखी रहती हैं तब तक भावना प्रत्यक्ष नहीं होती, मन और बुद्धि अपना कार्य वही करती हैं जो जगत में होती हैं लेकिन-जैसी-जैसी दिशाएँ होती हैं बाहर से भीतर की ओर जैसी-जैसी होती हैं-वैसी ही दृष्टि से प्रत्यक्ष अनुभूति होती हैं जाता है. और यही ईश्वर दर्शन या भगवत्प्राप्ति है।

जैसा कि पहले कहा गया था कि भावना के लिए आचरण की आवश्यकता होती है। यह व्यवहारिक बहिर्मुखी वृत्तियों को अंतर्मुखी करने के लिए प्रेरणा स्रोत जोकी दर्ज है।

मन, बुद्धि और चित्त का आपस में संबंध स्थापित हो गया। और ये अर्थ है मन-बुद्धि-चित्त उस संबंध को न केवल स्थापित कर लें बल्कि प्रेरणाओं का स्रोत है जो उसकी प्रेरणाओं को भी ग्रहण कर दीक्षा कर सकता है।

प्रेरणाएँ उपकरणों से आती हैं लेकिन ग्रहण करने की क्षमता न होने के कारण उनकी पहली भावना नहीं हो पाती। अंतर्मुखी प्रवृत्ति हो जाने से मनुष्य में प्रेरणाओं को ग्रहण करने की क्षमता प्रबल होती है क्षमताओं के साथ-साथ भावना प्रबल होती है और प्रशंसा का क्षेत्र विस्तृत होता है।

भावना जितनी गहरी होती है जीवन में उतनी ही मात्रा में रस की वृद्धि होती है। जहाँ भावना यथार्थता में मानव जीवन से उकता कर उसे नष्ट करने की ओर बढ़ता है या कदम उठाता है वहाँ भावना वहीं रहती है जहाँ वह जीवन को अपने स्थान पर अधिक से अधिक भर लेने के लिए उत्सुक रहता है। यूज़िता या नोटाता का यह चिन्ह भगवान प्राप्ति का ही निदर्शक है।

आचरण के लिए श्रद्धा और विश्वास की आवश्यकता है लेकिन ये दोनों तर्क प्रतिष्ठित नहीं हो रहे हैं। यह बताया गया है कि यह ज्ञान परंपरा की भावना का ही एक भाग है। उसे बढ़ाने के लिए तर्क के साथ संबंध स्थापित करके न करके श्रद्धा के साथ नाता जोड़ना चाहिए। वृत्तियों को अन्तर्मुखी करने की साधना से श्रीगणेश होता है। और अन्य वस्तुओं से प्रकाश की किरणें मानस पर उतरना या प्रदर्शित होना संभव हैं।यह रचना मेरी नहीं है मगर मुझे अच्छी लगी तो आपके साथ शेयर करने का मन हुआ।🙏🏻

अखण्ड ज्योति जून 1951

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