🕉️ईश्वर की आराधना🕉️ जिन लोगों के हृदय में शिव रूप में त्याग और वैराग्य बसा है, ऐश्वर्य, धन, सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं।

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🕉️ईश्वर की आराधना🕉️

जिन लोगों के हृदय में शिव रूप में त्याग और वैराग्य बसा है, ऐश्वर्य, धन, सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं।
आराधना- जिन लोगों के हृदय में शिव रूप में त्याग और वैराग्य बसा है, ऐश्वर्य, धन, सौभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं और जिन लोगों के हृदय में अंतःकरण लक्ष्मी, धन की लाग में मोहित हैं वे दरिद्र के पात्र ऐसे रहते हैं जैसे कोई सूर्य की एक ओर पलट कर अपनी छाया को पैकेट दौड़ता है, तो छाया उसे आगे बढ़ाती है। कभी-कभी एस्टिमेट में नहीं आता है। और जो कोई छाया से मुंह फेर कर सूर्य की और दौड़े तो छाया अपने आप ही पीछे भागती है, साथ छोड़ती ही नहीं।

कौन सी प्रार्थना सम्मिलित होती है? हमारा सेवक इतना कम हो कि मानो वह सत्य स्वभाव ईश्वर का अपना ही काम है तो रही उत्कृष्ट अति पूजा। पूजा की जरा नई स्थिति बच्चे की सी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा भी क्या भक्त और प्रबल है। बच्चे को उसके माता-पिता को अनंत शक्तिमान का दर्जा प्राप्त है। और उनके बल को अपना बल समझ कर माता की गोद में शाहनशाही कर देती है, रेल को भी धमाका कर देती है। पवन और पक्षी पर भी हुकुम का जादू है, दरिया को भी कोई लगता है और कोई चीज़ असम्बद्ध नहीं है। धन्य हैं वे पुरुष उच्च भाग्य वाले, इस जोर का विश्वास, सर्व शक्तिमान पिता में जम जाये।

दुःखी शैतान में और रंगीले मतवाले मस्त में खाना बस इतना ही है। एक के मंत्र में कामना की गई है कि अंश ऊपर है और नीचे भक्ति अंश है। दूसरे के चित्त में राम ऊपर है और काम नीचे है। एक यदि साक्षर है। तो उल्टा पलट से दूसरा राक्षस है।

माँगना दो प्रकार का है, एक तो तुष्ट “मैं” (अहंता, ममता) को मुख्य रूप से अपनी वृद्धि और दूसरा ज्ञान-प्राप्ति, तत्व-दर्शन, हरि सेवा को परम परिप्रेक्ष्य प्रदान कर अत्योन्नति माँगनी। प्रथम प्रकार की प्रार्थना तो मनो ईश्वर का तुष्ट नाम रूप (जीव) का अनुचर बनाना है। अपनी सेवा की ख्वाहिश इरनाश्वर को बुलाना है, उलटी गंगा बहाना है। द्वितीय प्रकार की प्रार्थना सीधे बात पर जानी है।

आत्मा में चित्त के लीन होते समय जो भी संकल्प सत्य होगा तो वैसा ही हो जाएगा, लेकिन यदि वह संकल्प अज्ञान, अधर्म और साध्यमय है तो काँटेदार विष अकेले एक की नई उगकर दारुण भावनाओं का विकास होगा। अहंता, ममता और भगवत् इच्छित संबंधी ईश्वर से प्रार्थना करना मैले तांबे (ताम्र) के आसन में पवित्र दूध भरना है। दुःखद कहानी जो सीखोगे तो पहले ही अपवित्र इच्छा को क्यों नहीं त्याग देते। अशुभ भावना में औरों का भी बुरा होता है और अपना भी नुकसान होता है। शुभ भावना, पवित्र भाव, ज्ञान, विज्ञान कल्याण की प्राप्ति में न केवल अपना ही होता है वर्ण परोपकार भी। मन में सत्वगुण, शांति, आनंद और शुद्धि हो तो हमारे काम स्वयं ईश्वर के काम होते हैं। पूरे होने में देर लग ही नहीं सकती।

आज पहले ही नहीं समझो, अभी समझ लो, तो मारोगे ही नहीं देर के वक्त गीताफ़े कौन काम आएगी? अपने जीवों को ही भगवान के गीत बना दो। मरते वक्त दीपक सागर क्या उजाला करेगा। हृदय में हरि ज्ञान प्रदीप अभी जला दो।

अखण्ड ज्योति जून 1951।यह रचना मेरी नहीं है मगर मुझे अच्छी लगी तो आपके साथ शेयर करने का मन हुआ।🙏🏻

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