खामोशी और बेबसी के लबादे को पहने , मनमानी आदेशों की बेड़ियों में जकड़ा बेसिक शिक्षक

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खामोशी और बेबसी के लबादे को पहने , मनमानी आदेशों की बेड़ियों में जकड़ा बेसिक शिक्षक

 

 

रिपोर्ट रघुनाथ प्रसाद शास्त्री

नीति निर्माताओं,अधिकारियों और बड़े नेताओं को लगता है शिक्षक मटरगस्ती कर रहा है इस कोरोना संक्रमण के दौर में….जब पूरा देश लॉकडाउन में था सभी दफ्तर बंद तो क्या शिक्षक ही स्कूल जाता ?
लोग कहते हैं 2 महीने आराम की तनख्वाह ली अभी स्कूल जाओ …मैं पूछना चाहती हूं जब पूरा देश बंद था तो सभी सरकारी कर्मचारी घर पर ही थे क्या उन्हें तनख्वाह नहीं दी गई??फिर इन प्रश्नों से सिर्फ शिक्षकों को जूझना क्यों पड़ रहा है????
हा आपने सही कहा शायद समाज में एक घृणा का नजरिया शिक्षकों के प्रति बढ़ता जा रहा है।

घर पर रहकर एक तरह से शिक्षक मेडिकल लीव अवेल कर रहा है।अपने अपने परिवार और अपने समाज की महामारी के संक्रमण फैलने से रक्षा कर रहा है
वह भी मन से नहीं बल्कि मजबूरी में क्योंकि कोरोना से लड़ने और बचने के लिये फिलहाल दुनिया के पास सिर्फ यही एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प है घर पर रहे सुरक्षित रहे। हम सुरक्षित रहेंगे हमारा परिवार सुरक्षित रहेगा तभी समाज और देश सुरक्षित रहेगा।
पूरी सुरक्षा के बीच बैठकर योजनाएं बनाना आसान होता है परंतु लोगों के बीच जाकर इस महामारी के समय अपनी रक्षा करना, आए दिन ,हर क्षण हर पल किसी अनहोनी के साथ जीने को मजबूर करता है।
अजीब बात है न………..एक तरफ सरकार को लगता है कि बच्चे इतने गरीब है कि उनके खाते में मिड डे पैसा और अनाज दिया जा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ इतने अमीर भी हैं कि सभी के पास ऑनलाइन क्लासेज के लिए एंड्राइड फ़ोन और डेटा होगा।………
दोनों की बातें विरोधाभासी हैं पर इन विरोधाभास के बीच शिक्षक सामंजस्य बैठाता हुआ अपनी बलि देने को मजबूर है………..

सबसे पहले हम सब शिक्षकों को ही एकजुट होना होगा

उन शिक्षकों को भी जो छोटे-छोटे पदों के लालच में अपने ही साथियों के विरुद्ध कार्यवाही हेतु पेन और कॉपी लेकर घूमते हैं उन्हें लगता है वह सरकार के आदेशों को पालन करने और अन्य साथी शिक्षकों के शोषण के लिए ही बने हैं इस मानसिकता से बाहर निकल कर सभी को शिक्षक और एक आम नागरिक की तरह सोचना होगा ………
शिक्षक कब तक बेबुनियादी बातों में बुनियादी योजनाओं और बेबुनियाद की कल्पना में पिसते रहेंगे……….. हमारे कुछ साथी किसी संगठन से जुड़े हैं तो पद की मोह में खुद को अधिकारी समझने लगते हैं वही कुछ साथी शिक्षक और सरकारी योजना के बीच में आदान प्रादान कर खुद को अधिकारी समझने लगते हैं जबकि हकीकत यह है कि सभी शिक्षक हैं और सभी को शिक्षक होने की ही तनख्वाह मिलती है………………….. अतः छलावे से बाहर निकले।
महामारी में सरकार द्वारा दिया गया शिक्षकों को विद्यालय भेजने का यह निर्णय कहीं ना कहीं शिक्षकों को आईना दिखाने का कार्य कर रहा है शिक्षकों को खुद समझना चाहिए कि सरकार उनका कितना हित चाहती है और उनके परिवार की सरकार के अधिकारियों को कितनी चिंता है पूरे देश में जहां कोविड-19 की दूसरी गाइडलाइन जारी हो रही है वही बेसिक शिक्षा के लिए एक अलग से लाइन जोड़कर आदेश जारी किया जाता है कि विद्यालय तो बंद रहेंगे परंतु शिक्षक स्कूल जाएंगे अगर इस आने जाने के क्रम में शिक्षक संक्रमण का शिकार होता है तो ना ही उसका कोई सरकारी बीमाहै नहीं महामारी में कोरोना वरियार को घोषित बीमा मिलेगाऔर ना ही उसके परिवार का कोई सुरक्षा कवच ……..यानी साफ है शिक्षक की कीमत एक इंसान की भी नहीं समझते यह उच्च पदों में बैठे हुए अधिकारी।
हो सकता है उच्च पद आसीन अधिकारी इस प्रकार के आदेश देने के बाद भूल भी जाते हो कि उन्होंने एक आदेश जारी किया था कि सभी शिक्षक स्कूल में जाएं …….. क्योंकि उन्हें नए आदेशों की तैयारी करनी है ..कोरोना महामारी फैली है इससे उनका क्या नुकसान हो सकता है यह सोचना तो बहुत दूर की बात है।
अतः शिक्षकों को दूसरों की तरफ देखने और अपनी मदद करने की अपेक्षा छोड़कर खुद की मदद करने के लिए आगे बढ़ना होगा………..…. इसमें एक बात और कहना चाहूंगी अपने ही साथियों के लिए कुआं खोदने वाले उन शिक्षकों को भी भविष्य में बहिष्कार का सामना करना पड़ सकता है जो आदेश आते ही मिनटों में पूरा करके दिखा देते हैं कि वह कितने योग्य शिक्षक हैं जबकि यह नहीं देखते कि उनके साथी जो शायद इतनी सुविधा संपन्न नहीं है इस कार्य को कैसे कर पाएंगे।
आजकल एक नया ट्रेंड भी चला है कि जो शिक्षक उच्च अधिकारियों के जितने ज्यादा आदेशों का पालन करता है उसे किसी न किसी रूप में कोई न कोई पुरस्कार दिया जाता है और वह बड़ा खुश होकर अपनी फेसबुक और व्हाट्सएप वॉल पर पोस्ट करता है कि मेरी छोटी सी कोशिश………..
नवाचार करिए बच्चों का उद्धार करें इसमें कोई गुनाह नहीं पर दिखावे के लिए वह काम ना करें जो आपके लिए सुविधाजनक और आने के लिए असुविधा का कारण बने। ग्रीष्मकालीन कक्षाएं चलाने का दुष्परिणाम इस वर्ष सामने आया….. जबसे बेसिक शिक्षा के विद्यालय चल रहे हैं जून माह में अवकाश रहता था और हम सब रजिस्टर में भी ग्रीष्मकालीन अवकाश लिख देते थे परंतु इस बार जून माह रजिस्टर में साइन कराए गए हैं शिक्षक विद्यालय जाकर जून माह में बैठे…….यह कहीं ना कहीं ग्रीष्म कालीन अवकाश खत्म करने का षड्यंत्र है जबकि हमें कोई प्रतिकर आकाश नहीं मिलता……………….
आज भी नगर क्षेत्र यह बड़े नगरों के आस पास के गांव में बने प्राथमिक विद्यालय को खोल कर बैठने में शिक्षकों को कोई आपत्ति नहीं…. परंतु दूर दराज इलाकों में प्रदेश भर में फैले हुए ग्रामीण विद्यालयों में पहुंचने वाले शिक्षक को बिना लोगों से संपर्क किए सार्वजनिक संसाधनों से पहुंचना बहुत ही जोखिम भरा है।
जो काम दिए गए हैं वह शायद कुछ घंटों के ही हैं परंतु उसके लिए 8:00 से 1:00 बजे तक विद्यालय में बैठना इस महामारी के समय में आपात स्थिति की तरफ धकेलने वाला फैसला है।
ऐसा कोई काम लिखित आदेश में नहीं है जो घर से नहीं हो सकता रही अभिभावकों का हस्ताक्षर तो बहाना है………….कायाकल्प की बात कायाकल्प योजना प्रधानों के द्वारा कराए गए कार्य की योजना है एक स्वतंत्र संस्था से कार्य देखकर उनका ऑडिट क्यों नहीं कराया जाता है?
विद्यालय की एक चाबी प्रधान को क्यों नहीं दी जाती ताकि वह अपनी सुविधा अनुसार कार्य करवाया रहे बहुत से विद्यालय में कार्य कल का काम पूरा भी हो चुका है……इसके बावजूद चौकीदारी का काम शिक्षक को सौंप दिया गया……जबकि जमीनी सच यही है कि प्रधान जी एक टूटी ईट भी प्रधानाध्यापक के कहने पर नहीं लगाते…..
इतिहास गवाह है जब से प्राथमिक विद्यालय बने ऐसा कभी नहीं हुआ कि १जुलाई को शिक्षक और विद्यार्थी स्कूल ना गए हो, बहुत ही उत्साह पूर्वक खुशी-खुशी मन से नित् नूतन आशाओं के साथ सभी शिक्षक और शिक्षार्थी विद्यालय जाते रहे हैं …….पर आज परिस्थितियां सामान्य नहीं है आज हम लोग एक तरफ कोरोना महामारी से बचने के लिए अपने घरों में
कोरनटाइम हो रहे हैं ,आज हमारे देश में संक्रमित लोगों की संख्या 6 लाख के पार हो रही है हजारों लोग मर रहे हैं लखनऊ के लगभग हर मोहल्ले में एक पेशेंट जो कि कोरोना से संक्रमित है मिल ही रहा है…….
कई जगह से रास्ते रोक दिए गए हैं इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सार्वजनिक संसाधनों का प्रयोग करके भीड़भाड़ से होता हुआ शिक्षक विद्यालय पहुंचता है यहां सिर्फ पहुंचना ही ना काफी नहीं है, वहां गांव वालों के बीच विभिन्न कागजों को एकत्र करता है और उसके बाद उन्हीं दुविधाओं के बीच घर वापस आता है कि कहीं आज वह किसी मरीज के संपर्क में तो नहीं आ गया कहीं वह इस महामारी की चपेट में तो नहीं आ गया…………..और तो और कहीं-कहीं विद्यालय खुला और शिक्षकों को आता देखकर के बच्चे भी ड्रेस पहनकर के विद्यालय पहुंच गए मैंने आज ही एक वीडियो देखा जहां पर एक पत्रकार पहुंच गया है और सोशल डिस्टेंसिंग का सवाल पूछते हुए वहां के शिक्षक को परेशान कर रहा है कि बच्चे मास्क नहीं पहने हैं सोशल डिस्टेंसिंग नहीं है अब आप ही बताइए इसमें उस शिक्षक का क्या दोष है??
गांव वाले कहीं-कहीं लड़ने चले आ रहे हैं कि मास्टर साहब आप स्कूल में अकेले बैठे रहते हैं बच्चों को पढ़ाते नहीं …..उन्हें विद्यालय क्यों नहीं बुला रहे हैं जब अपना इतनी दूर से चले आ रहे हैं तो बच्चों को पढ़ाते क्यों नहीं है कहीं-कहीं गांव के दबंग लोगों ने अध्यापकों को धमकाया भी..….. अब शिक्षक गांव वालों को क्या समझाए कि आदेश के तहत खाली हमें विद्यालय खोल कर बैठना है बच्चों को आना नहीं है……….. इन विपरीत परिस्थितियों में यहां बैठकर हम सिर्फ आदेश का पालन कर रहे हैं।
अभी कुछ महीनों या कुछ सालों से हम सब मानव संपदा का नाम सुन रहे हैं वर्षों से सर्विस बुक बनी है और उसी में शिक्षक आया और चला गया है ,परंतु अब मानव संपदा फीडिंग के नाम पर शिक्षकों का शोषण किया जा रहा है जो लोग फीड कर रहे हैं वह भी अगर शिक्षक हैं तो परेशान हैं क्योंकि उन्हें कोई उपयुक्त पर प्रशिक्षण नहीं दिया गया और आए दिन नए आदेश के तहत यह बता दिया जाता है कि अगर अमुक दिनकर शिक्षकों ने अपना डाटा सही नहीं करवाया तो उसे सस्पेंड कर दिया जाएगा या उसका वेतन काट लिया जाएगा……….. अजीब मनमानी है जब हमने अपनी पूरी सर्विस बुक बनवाकर ऑफिस में रख दी है तो फिर अब शिक्षक की क्या जिम्मेदारी है ?????? शिक्षक विवरण कोई छुपा हुआ तो है नहीं फिर सही क्यों नहीं फीड होता…………. बेसिक शिक्षा के अधिकारी ऐसे ऐप लेते ही क्यों हैं जहां पर इतनी त्रुटियां हो ??? कार्य करने की कर्मचारियों को सूचित ट्रेनिंग क्यों नहीं देते?? गलतियां इतनी है कर्मचारियों को सुधारना नहींआ रहा है…. परंतु क्या करिएगा गला दबाने के लिए तो मिलता बेजुबान शिक्षक ही है।
अतः आम शिक्षक को लखनऊ के उन सभी अधिकारियों जो नित नए आदेश जारी करते हैं तथा प्रमुखों से बात करनी चाहिए और अपनी बातों को बताना चाहिए *…….क्योंकि अन्याय करने वाला तो गलत होता ही है अन्याय सहने वाला उससे बड़ा अपराधी…..*
1 जुलाई से कोविड-19 की नई गाइडलाइन जारी होने के बाद इतनी बड़ी महामारी को हल्के में लेते हुए और शिक्षकों की जान की परवाह न करते हुए अधिकारियों ने जो आदेश जारी किए हैं उसके खिलाफ तथा विद्यालयों में शिक्षकों को ना भेजा जाए इस मांग को लेकर सभी संगठनों ने अपने लेटर पैड का इस्तेमाल किया जो शिक्षकों के हित की चिंता को दिखाता है इस हेतु सभी साधुवाद के पात्र हैं परंतु लड़ाई यहीं खत्म नहीं हो जाती अभी हम सब को एकजुट होकर इस लड़ाई को आगे ले जाना होगा तथा तब तक लड़ना होगा जब तक इस प्रकार की मनमानी आदेश वापस नहीं हो जाते….. …………………………. जो पत्थर में रास्ता बन सकता है चांद में वाहनों को हो सकता है तो फिर यह कोई असंभव कार्य नहीं ,
बस हमें पद, प्रतिष्ठा ,संगठन, जातिवाद सभी बातों को दरकिनार करके एकजुट होना होगा, क्योंकि ऐ सभी गुण अच्छे तो है परंतु हमें शिक्षक होने की पहचान से दूर करते है।
निश्चित रूप से एक दिन यह एकता ही नई शिक्षक राजनीति की नींव बनेगी … और समाज में शिक्षकों की गिरती हुई साख को सम्मानजनक स्थान प्रदान कर आएगी……जहां स्वार्थ,लालच , और सिर्फ एक नाम होने की स्वार्थी इच्छा , झूठीप्रतिष्ठा और मैं बड़ा हूं का घमंड नहीं होगा, होगा तो बस एक साथ बेबसी की बेड़ियों को तोड़ने का जुनून……………………

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